Monday, 9 August 2010

हे कान्हा !

जो मैं होती तेरी सखी
रहती  सदा तेरे संग ......

सांझ -सवेरे से
होती तेरे साथ, थामें हाथ  .......
घूमा करती वन -उपवन
लुका छिपी खेलती
तेर संग ........
माखन चुराती ,मटकी फोड़ती
भागती तेरे साथ,हाथों में लेके तेरा हाथ 
तेरे संग .........
धेनु चराती,सुनती मुरली तान
 और बैठ वट-वृक्ष की छाँव
होती सदा तेरे संग......

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