Monday, 23 May 2011

मैं धन्य हूँ
जिनके कारण,
मैं तेरे दर तक पहुँची.....

तेरा दर खुला देख
पत्थर की मूर्ती से अपना दुःख छुपा ना सकी
और
कहते -कहते तुझ से
हर बात कहने लगी
तू मौन सुनता रहा मेरी .....
और
मैं तेरी आँखों से
निष्कपट -भाव में मित्रता पाती गयी
मुझे अब तुझसे स्नेह
हो गया .....
और
इतना कि में स्वयं को
खोने लगी और तुझे
पाने लगी ....
और
इतना कि
मैं तेरे साथ हूँ 
अब चारों याम ...... 

Thursday, 24 February 2011

क्या पाया है मैंने इस जीवन में तुमरे सिवा .......

न सूझता है मुझे कोई,
       इस मृग-तृष्णा में तुमरे सिवा .....

न बंधना है मुझे कोई,
       ऐसी मंजुषा में, तुमरे सिवा....

न सुख कुछ देता है मुझे कोई,
        इस अनंत मौन में ,तुमरे सिवा .....

न मेरी राह पर दिखता है मुझे कोई,
         चले जो प्रतिबिम्ब बन ,तुमरे सिवा ..... 

Monday, 7 February 2011

मुझे मत रोको,
 मुझे श्याम से मिलने जाना है......
मत बढाओ हृदय की वेदना को,कुछ हल्का करने जाना है...
इदर-उधर भटकूँ जाऊँ किधर को,राह बताये कोई सफर अनजाना है...
पा कर कृपा तेरी को,तुझ में ही रम कर खो जाना है..
तुझ में विलीन हो के ,तेरे में ही तुझ को पा जाना है...

Wednesday, 19 January 2011

ये क्या हुआ हे मुझे
     जो तेरा  मधुर संगीत बहा मुझमें .....
तेरी स्तुति की निरंतर गूँजें
    जो मौन  शांति भर गई मुझमें .....
तेरी कृपा आई बहती हुई
    जो बहा ले गई तेरी  ओर मुझे.....
तेरी मधुर वाणी की झंकार
   जो बजने लगी हजारों में मुझमें .....
अपनी तो सुध ही  ना रही
   जो तुझे पा लिया था अपने में .....

Friday, 3 December 2010

DAYA MAA ke maha samadhi diwas par.....SHRDHAANJILI

हे माँ!
धन्य हुआ तेरा जीवन,कोटि-कोटि तुझे हे नमन
पाया तुमने सफल जीवन,कृपा का किया अभिनंदन
 एक छोटी सी थी आशा ,देख पाने की तुझे थी "लालसा"
परम गुरु का प्रतिबिब्म मैं ,कभी देख पाती तेरे चेहरे में 
बह जाऊँ कभी कृपा की धारा में,दर्शन देना मेरे ह्रदय हे आँगन में ........

Saturday, 14 August 2010

मुझे ले चलो अपने धाम,जहाँ मिले मुझे शाँत विश्राम .........

तुझ में लीन हो जाऊँ मैं, खुद को रोक  न पाऊँ मैं
जग की पीर सही न जाये ,पल-पल मैं बढ़ती ही जाये
सही न जाये ये दूरी ,मिलन की आस करो पूरी ......

भँवर में डूबी जाऊँ मैं  ,वहाँ भी तुझे न पाऊँ मैं
काँप  रहा मेरा तन-मन ,रोम-रोम में बस जाओ तुम
गहरी नींद में सोना चाहूँ, शीतल-सा मातृत्व पाऊँ ........

Tuesday, 10 August 2010

मैंने
अपने में,
तुझे पाया -हर पल
मैं बँधी रही तेरी डोर से ......

मुझे स्वीकार कर ,
मेरा मान बढ़ा दिया ......

आज तेरी शक्ति से
हूँ ज्योतिर्गमय .......

हे अटूट विश्वास मेरा
तू मुझ में
हे कहीं समाया......