Thursday, 24 February 2011

क्या पाया है मैंने इस जीवन में तुमरे सिवा .......

न सूझता है मुझे कोई,
       इस मृग-तृष्णा में तुमरे सिवा .....

न बंधना है मुझे कोई,
       ऐसी मंजुषा में, तुमरे सिवा....

न सुख कुछ देता है मुझे कोई,
        इस अनंत मौन में ,तुमरे सिवा .....

न मेरी राह पर दिखता है मुझे कोई,
         चले जो प्रतिबिम्ब बन ,तुमरे सिवा ..... 

3 comments:

  1. क्या तारीफ करूं मैं, मेरे पास तारीफ करने के लिए अल्फाज नहीं है।

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  2. एक बार इश्वर में मन रम जाए , तो फिर कुछ सूझता ही नहीं उनके सिवा.

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  3. यह दुर्लभ प्यार सिर्फ मीरा ने महसूस किया था....शुभकामनायें !

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