क्या पाया है मैंने इस जीवन में तुमरे सिवा .......
न सूझता है मुझे कोई,
इस मृग-तृष्णा में तुमरे सिवा .....
न बंधना है मुझे कोई,
ऐसी मंजुषा में, तुमरे सिवा....
न सुख कुछ देता है मुझे कोई,
इस अनंत मौन में ,तुमरे सिवा .....
न मेरी राह पर दिखता है मुझे कोई,
चले जो प्रतिबिम्ब बन ,तुमरे सिवा .....
न सूझता है मुझे कोई,
इस मृग-तृष्णा में तुमरे सिवा .....
न बंधना है मुझे कोई,
ऐसी मंजुषा में, तुमरे सिवा....
न सुख कुछ देता है मुझे कोई,
इस अनंत मौन में ,तुमरे सिवा .....
न मेरी राह पर दिखता है मुझे कोई,
चले जो प्रतिबिम्ब बन ,तुमरे सिवा .....
क्या तारीफ करूं मैं, मेरे पास तारीफ करने के लिए अल्फाज नहीं है।
ReplyDeleteएक बार इश्वर में मन रम जाए , तो फिर कुछ सूझता ही नहीं उनके सिवा.
ReplyDeleteयह दुर्लभ प्यार सिर्फ मीरा ने महसूस किया था....शुभकामनायें !
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